युवा दिवस बनाम आज की युवा मानसिकता

युवा दिवस बनाम आज की युवा मानसिकता

पूरे भारतवर्ष मे ‘युवा दिवस’ स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन अर्थात 10 जनवरी को समर्पित यह दिवस युवा दिवस बड़े धूमधाम , श्रद्धा व सम्मान के साथ मनाया जाता है। यह दिवस स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन के अवसर इस बात को दुहराने के वास्ते ही प्रतिवर्ष बड़े उत्साह व उल्लास के साथ स्कूल, कॉलेज व अन्य शैक्षणिक संस्थानों में मनाया जाता है । प्राण लेते है कि निःस्वार्थ व श्रद्धाभाव से विवेकानंद जी के आदर्शो व विचारों को जीवन मे आत्मसात कर उनके पदचिन्हों पर चलेंगे। उनके बताएं रास्तों पर चल जीवन को धन्य बनाएंगे। समाज को गौरवशाली बनाएंगे।
विवेकानंद जी के आदर्शों को माने तो उन्होंने लोगों में ‘विश्व बंधुत्व’ की भावना जागृत करते हुए युवाओं को ‘कर्मयोगी’ बनने की प्रेरणा दी। यह कर्मयोगी भावना संभवतः श्रीमद्भागवत ‘गीता’ के उन वचनों से प्रभावित बातें है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने लोगों को कर्मयोगी बनने की प्रेरणा सदियों पहले दी थी। जिसके अनुसार मनुष्य को अपने कर्म पर विश्वास करनी चाहिए ना कि कर्म कर फल प्राप्ति की चिंता करनी चाहिए। कर्म के अनुसार उसके फल का मिलना तय है। विवेकानंद जी भी अधुनिक युवाओं से कुछ ऐसा ही अपेक्षा करते थे। उनकी माने तो युवा राष्ट्र की वो असीम शक्ति व पूंजी है जो समाज मे बदलाव लाने की पर्याप्त क्षमता रखता है। विवेकानंद जी युवाओं को खुले तौर पर कहते थे कि उठो, जगो औऱ तब तक प्रयास करो जबतक कि लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाय। वो युवाओं में गर्मजोशी का भाव भरते हुए उन्हें मेहनत करने की सीख दी। ऐसा होने से वो किसी पर ना तो किसी बात के लिए आश्रित रहेंगे और ना ही किसी से पैरवी पैगाम की आस रखेंगे। इससे एक ऐसे समाज का निर्माण होगा जिसमें किसी के दिल मे कोई लालच व बेईमानी नही होगी। और ना ही किसी की अधीनता में रहने की बात होगी व शोषण की कोई दुःखद कहानी की चर्चा होगी।
विवेकानंद जी सामाजिक व राजनीतिक सेवा भी निःस्वार्थ भाव से लोगों को करने की अपील की। उनके अनुसार इस दुनिया मे सबमे पॉजिटिव है निगेटिव कुछ भी नही। शायद इसलिए भी उन्होंने अपने शिष्यों से एक-एक पॉजिटिव बातो को जीवन मे लेकर आगे बढ़ने की बातें कही। इसप्रकार उन्होंने इधर-उधर की उधेड़बुन की बातें ना कर हमेशा ‘केंद्रित विचारों’ पर ही ध्यान चिंतन मनन करते थे और करने के लोगो को प्रेरित करते थे जिससे समस्त विश्व एक परिवार की तरह एक दूसरे के हितार्थ व्यवहार करें। सभी को भाई बंधु मानते हुए अपनो – सा व्यवहार करना चाहिए। ऐसा की वहां ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, अधर्म, आदि नकारात्मक विचारों का कोई स्थान शेष ना रह जाये। विवेकानंद जी सकारात्मक विचारों को आदर्श मानते हुए अपने व्यक्तित्व को उसी रूप में लोगो को अवलोकित कराना चाहते थे जिसकी आभा से आधुनिक युवा चमक उठे। दमक उठे। अभिप्रेरित हो जाये इतना कि वो स्वर्णिम भारत की रचना करने की जिद्द ठान ले। प्रयास इतना कि यहां कि संस्कृति पूरे विश्व समुदाय के लिए एक आदर्श स्थापित कर सके।
स्वामी विवेकानंद जी के इन आदर्शो के मद्देनजर आज की युवाओं के व्यवहारों का एक समीक्षात्मक दृष्टिकोण डाले तो सार्थक रूप से अंतर दिखाई पड़ता है। बदलते मौसम की तरह इन युवाओं की मानसिकता भी बदल गई है। स्वामी विवेकानंद जी की बातें अब प्रवचन की तरह मात्र सुनने में ही लोगो को अच्छा लगता है। व्यवहारिकता इसके विपरीत है। कर्मयोगी युवाओं को जहां उन आदर्शों पर चलते हुए लोगों में जहां निःस्वार्थ सेवा भावना बरकरार रहनी चाहिए वो पूरी तरह स्वार्थ के रंग में रंग गया है। अब तो वो हर काम को अपने पहुंच व पैरवी के बल कराकर अपने को काबिल बताना चाहते है। झूठी शान दिखाते है। दंभ भरते है। व्यामोहि विचार रखते है।
युवाओं में इस बदली मानसिकता ने उसमे एक तरह से भटकाव ला दिया है। इतना कि वो सकारात्मक चिंतन की राह छोड़ नकारात्मक भावना से काम कर रहे है। यूँ कहे कि इधर अद्वितीय भौतिक परिवर्तन ने भी उनके संस्कारों को भी बदल दिया है। अब तो मानकों के विपथ सोचते है। बोलते है। कदम बढ़ाते है। बल्कि यूँ कहे कि उनके विचारों व व्यवहारों में चारित्रिक दोष आ गया है। वो मानो स्वामी विवेकानंद जी के उन आदर्शो को भुला बैठें है।ऐसा लगता है कि चेतन में सिर्फ उनकी मूर्ति और एक दो श्लोक ही स्मृति शेष है।

कारण जो कुछ भी कहे इतना तो तय बात है कि आज के युवा में खासकर के सामाजिक व राजनैतिक विचलनशीलता चर्मोत्कर्ष पर है जिसका समर्थन आये दिन अखबार की सुर्खियां भी करती है।
आज के युवा ऐसा कौन-सा अपराध नही किया होगा जिसमें उसकी प्रत्यक्ष या परोक्ष सहभागिता ना रही हो। नैतिकता या सामाजिक मानकों का उल्लंघन कर ना चलने की प्रवृति रखता हो। युवा मानसिकता समाज विरोधी प्रवृतियों से लबरेज हो चली है। मौका मिला नही कि चोरी, छिनतई, डकैती, हत्या, बलात्कार, लूट, जैसे घृणित अपराध करते बाज नही आते। रंगे हाथ पकड़े जाते है। चिंतनीय विषय है वो माँ-बाप, सहोदर व बड़ो से बदतमीजी तक करते है। उनका दिल दुखा चलते है। बिडम्बना कहे या उन आदर्शो की कमजोरी या दोषपूर्ण समाजीकरण या बदकिस्मती कि आज युवा जमकर नशा करते है। औरों को नशा कराते भी है। समाज मे अशांति, भय, तनाव व असुरक्षा का माहौल बनाते है। स्वामी विवेकानंद जी के विचारों में कौन-सी वो अवगुण वाली बातें थी जिसका की अनुसरण युवा जमकर कर रहे है। शायद कोई नही । शायद आज संस्कारों की विषमता के साथ गुणात्मक शिक्षण प्रशिक्षण का अभाव भी है जिस कारण समाज मे नैतिकता को जगह नही मिल पा रही है। यही कारण है कि मनोवैज्ञानिक मसलों (1954) की प्रेम संबंध व सुरक्षा के स्तर तक भी लोग नही पहुंच पा रहे है। ऐसे में संतुष्टि की अंतिम पायदान आत्मसिद्धि (सेल्फ एक्चुअललेजेसन) तक पहुँचने की बात एक कल्पना व परिकल्पना से कम नही है।
इन बदलते परिवेश में स्वामी विवेकानंद जी की विश्व बंधुत्व की भावना भी कुंठित हो चली है। युवाओं में इतनी आक्रामकता आ गई है कि वो यह भी भूल चले है कि विवेकानंद जी कोई थे भी। उनकी आदर्श की बातें तो छोड़ ही दे। जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नाम युवाओं में एक दूसरे के प्रति दिलोदिमाग में इतनी नफरत ना जाने कहाँ से कैसे आ गई है कि उन्हें कुछ अच्छा समझना भी बुरा लगता है। प्रवचन लगता है। कल्पना लगता है। मिथ्या तर्क लगता है। जिस आक्रामक भावना का नतीजा है कि राष्ट्रीय एकीकरण में बाधा पहुंच रही है। बात बे बात एक दूसरे पर पत्थर बरसाते है। खून बहाते है। इंसानियत को शर्मसार करते है। बदले की भावना में जीते है। बहु बेटियों की इज़्ज़त आबरू से खेलते है। असंतुष्ट होकर असंतुष्टों की भीड़ खड़ी करते है। जिस कारण नक्सली, देशद्रोही तक का संज्ञा पाते है। जो दरअसल ऐसा कुछ भी नही। यह तो अस्तित्व के लिये उठाया गया प्रतीकात्मक कदम है। एक संघर्ष है।
यह एक चिंतनीय मोड़ है जहां विलुप्त होते स्वामी विवेकानंद जी के विचारों को फिर से संचयित कर बौद्धिक चिंतन करने की जरूरत है । सिंचित करने की आवश्यकता है। जिससे कि आनेवाले पीढ़ी को सही दिशा देते हुए वैसा व्यक्तित्व निर्माण करने की बातें हो और जहां खोई सामाजिक गरिमा को पुनः बहाल की जा सके। एक स्वच्छ, सुन्दर व सुरक्षित समाज की रूप रेखा तैयार की जा सके।

Niraj Singh

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