स्वामी विवेकानंद औऱ युवा मनोविज्ञान:डॉ विनोद शर्मा

डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग,
सिकामु विवि, दुमका।

देश मे प्रति वर्ष स्वामी विवेकानंद जी की जयंती ‘युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस की सार्थकता युवाओं के लिए केवल इसलिए नही है कि विवेकानंद जी उनके लिए युग पुरुष का स्वर्णिम उदाहरण हैं व उनके विचार व आदर्श उच्च कोटि के थे जो आज भी युवा धड़कनो में जीवंत है बल्कि इसलिए भी है उनके विचारों की व्यवहारिकता में सुख, शांति, समृद्धि, प्रेम, ईश्वरीय , देश भक्ति , मानवता आदि के असीम विलक्षण गुण विद्यमान हैं जो वर्त्तमान युवा पीढ़ी के लिए अथाह प्रसांगिक हैं। विचार सारे अमृत के समान हैं। यहाँ यह कहना उतना ही उचित जान पड़ता है कि कौन ऐसा युवा होगा जिसको स्वामी विवेकानंद जी का विचार आदर्श बोध नही लगता होगा? शायद ऐसा कोई नही होगा। अर्थात वर्त्तमान सभी युवा पीढ़ी विवेकानंद जी के जीवन आदर्शों को जीवन में उतार जिंदगी जीना चाहते है।।
मगर यह कहना उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि युवाओं में चाहत तो है चिंतन भी है पर उसे व्यवहारिक रूप से संगत व दृढ़ बनाये रखना चुनौतियों से कम नहीं हैं।
वर्त्तमान परिवेश में यथार्थ की दृष्टिकोण से यह कहना अतिश्योक्ति नही होगा कि व्यक्ति विशेष को आदर्श व व्यवहारिकता तभी अच्छी लगती है जब मन शांत , स्वच्छ व प्रसन्न हो। तनावों व चिंताओं से मुक्त लोग खुशी के वातावरण में जीवन जी रहा हो।
यथार्थ की कसौटियों पर कस कर व्यवहारिक रूप से कहे तो आज के युवा जहां असंतोष, सामाजिक भेदभाव, कुव्यवस्था, हीनता की भावना आदि के राहों पर चलने को मजबूर हैं वहीं बेरोजगारी, गरीबी व भ्र्ष्टाचार ने युवाओं के जीवन शैली को विकृत कर रख दिया है।
युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद जी आदर्श तो है। उनके जीवन दर्शन में जीने की ख्वाहिश तो है। मगर उन सपनों को बदलते परिवेश ने, भौतिकवादी सोच ने, नव उदारवादी परिकल्पना ने , बबलती गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी ,आदि ने इतना ज्यादा प्रभावित किया कि वो विषादों व चिंताओं में घिर सामाजिक मानकों से इतना अधिक विचलित हो गए है कि उन्हें मुख्यधारा में लाना भी एक चुनौती बना हुआ है।
यह पूरे समाज के लिए जितना चिंतनीय विषय है वह उतना ही निंदनीय बात भी। आज युवा इस भटकाव के दलदल में जा फंस ना केवल झूठ बोल रहे हैं , अधर्म कर रहे हैं बल्कि हर तरह के नशा, हत्या व अपराध भी कर रहे हैं। योग्यता के अनुसार ना काम पाकर ,अवसरों का लाभ नही मिलने की निराशा में व अपने को ठगी व अपमानजनक महसूस कर आवेश में आकर बेरोजगारी व गरीबी से निजात पाने के लिए चोरी , लूट, धोखाधड़ी से लेकर साइबर अपराध तक कर रहे है।
युवाओं का विचलित मन इस बात को स्वीकार कर चलने को तैयार हो चल रहा है कि पैसा है तो शोहरत हैं। दुनिया उसी को जानती हैं, पहचानती है या वैल्यू देती है जो चांदी के चम्मच में खाने की हस्ती रखता है। समाज व मीडिया भी उसी को हीरो मानती है जिसके पास दौलत है। पहुँच है। पैरवी है। अकूत संपदा है। भले ही यह बाते नैतिक दृष्टि से झूठ लगे। मगर सच्चाई यह भी है कि युवा मन धर्माचरण व आदर्श को भी अब मात्र दिखावे की चीज मानते हैं। जो एक दिन के उत्सव के बाद भूल कर अपने अनुभव का जिंदगी जीना ज्यादा पसंद करते है औऱ जिसके मूल में चारबाग का सिद्धांत तो मनोविज्ञान का आनंद का नियम शेष रह गया मालूम पड़ता हैं। औऱ जहाँ नैतिकता अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत व बेबस दिखती है। यही कारण है समाज विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में नाम रौशन करते हुए भी समाज आज अनेको किस्म के विसंगतियो का शिकार है औऱ जिसके भ्रष्ट चक्की में पीसकर युवा भावनाएं कुंठित हो आत्महत्या कर रही हैं।

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