अमानवीय व मनोविकारी कृत्यों से दहलती मानवता:डॉ विनोद शर्मा

डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग
एस पी कॉलेज, दुमका।

कहते है कि भगवान ने धरती पर अगर कुछ भी खूबसूरत चीज बनाया है तो वो है इंसान। वो इंसान जो उच्च बुद्धि व मानवीय संस्कारों के कारण सभी जीवों में श्रेष्ठ माना जाता है। जीवो में मानव को महान होने का गौरव इसलिए प्राप्त नही है कि वो उच्च चिंतन करता है, रचनात्मक क्षमता रखता है व संबंधों का एक सार्वभौमिक जाल बुनता है , बसुधैव कुटुंब सिद्धांत का पालन करता है बल्कि इसलिए कि उनमें मानवीय मूल्यों को सम्मान करने, उसे व्यवहारकुशल बनाने, एक दूसरे के प्रति प्रेम, त्याग, समर्पण, सहयोग आदि का भाव रख जीने का इरादा रखता है। बुराइयों का नाश कर अच्छाई की जीत सुनिश्चित करते सच्चाई का साथ निभा कर चलने को हरदम तैयार रहता है। इसे वेद, पुराण, बाईबल, गुरुग्रंथ, कुरान आदि की भाषा या मानक विशेष की कल्पना समझे , संस्कार समझे , धार्मिक नीति माने या लोगों को सामाजिक रिश्तों व बंधनो में बांधे रखने का एक समूल मूलमंत्र।
कहने का तात्पर्य यह कि लोगों को मानवता के परिधि में रहकर ही जिंदगी जीना चाहिए जहां नकारात्मक शक्तियों , असुरी विचारों व पाशविक प्रवृत्तियों का कोई बोलबाला नही हो। ना ही उसका कोई प्रभाव।
संक्षेप में कहे तो मानव जीवन सभ्य समाज के द्वारा निर्मित सभी मानकों पर खरा उतरता हुआ आदर्श व्यवहार हो। रिश्तों व भावनाओं के चाक पर जीवन घूमता हुआ परिलक्षित हो। जहाँ मानवमूल्यों को चाहने ,समझने व स्वागत करने वाले लोग हर कदम पर अडिग खड़ा हो। जो जाति,धर्म , क्षेत्रीयता, लिंग, आदि के संकीर्ण विचारों से ऊपर उठकर व्यवहार करता हो। जहाँ ना बैर हो, ना चिंता,ना किसी किस्म का भय व असुरक्षा। सिवाय प्रेम व शांति के सौहार्दपूर्ण वातावरण के।
मगर इसे दुर्भाग्य समझे या समय की नियति जहाँ लोग नकारात्मक विचारों से प्रभावित हो, विपथ हो मानवता की सारी सीमाओं को लांघ पाशविक प्रवृत्तियों-सा आचरण कर रहे है। स्वार्थ सिद्धि के खातिर लोग एक धोखाधड़ी व छीन झपट कर रहे है। जहां देखो उधर ही ऐसे स्वार्थी व नकारात्मक व मनोविकारी प्रवृत्तियों की बाढ़-सी दिखती है। ऐसे जैसे अपसन्दनीय ,घृणित व विषादी व्यवहारों की हौड़-सी मच गई हो।
आज लोगो में एक दूसरे का समाज- मनोवैज्ञानिक व्यवहार शंकाओं से भर चला है। वे ना केवल दूसरों पर अविश्वास जताते है बल्कि मामूली से तर्क भेद पर दुश्मन-सा व्यवहार करने लगते है। भावनाओं का आहत करने लगते है जिससे मानवता अचंभित हो दहलने लगी है।
साधारणतःपाशविक प्रवृत्तियों से तात्पर्य जानवरों के उस गुण से है जो अपने स्वार्थ या जैविक भूख के सिवाय किसी का कुछ भी नही सुनता है और ना ही भविष्य की सोचता है। उसके आगे क्या कायदा, क्या कानून, और न कोई नियम,न धर्म की कोई बात उसके पल्ले पड़ने वाली। जब चाहा इच्छानुसार व्यवहार करने के लिए बाध्य हो जाना उसकी एक मात्र फितरत है। यह कहना भी गलत नही होगा कि वो जानवर अपने अस्तित्व के ख़ातिर अपने बच्चों के साथ भी दुर्व्यवहार कर डालने से परहेज नही करते है। ना हिचकिचाते है। उसकी वफादारी दूसरी बात है।
आज बिडम्बना इसी बात की हो चली है कि लोग भौतिक सुख की लालसा में, दिखावे के जिंदगी में ना केवल सामाजिक मानकों को ताक पर रख कर चल रहे है बल्कि पाशविक प्रवृत्तियों के आदि भी हो जा रहे है।
आधुनिक मनोविज्ञान के जनक सिगमंड फ्रायड की माने तो जब इड अर्थात जो आनंद के नियम पर काम करता है ईगो व सुपर ईगो अर्थात जो क्रमशः वास्तविकता व नैतिकता के सिद्धांत पर काम करता है , के ऊपर जब इड किसी भी कारण से भारी पड़ता है यानि इड अपने को दबंग साबित करता है तो लोगों में पाशविक प्रवृत्तियां सर चढ़ कर बोलने लगती है। फिर उसे ना तो मर्यादाओं, मानकों, रश्मो रिवाज, धर्माचरण आदि का ख्याल रहता है और ना ही मानवीय भावनाओं के प्रति आदर भाव ही शेष। जिस पाशविक प्रवृत्तियों के भड़कते व उठते लपटों के आग में घी का काम आज की सामाजिक व राजनैतिक कुव्यवस्था तो करता ही है वहीं पूरी मानवता को रक्तरंजित व बदनाम कर देने वाली इस आग के फैलाव में बिकाऊ मीडिया भी कोई कसर बांकी नही छोड़ती है।
वर्त्तमान समय कुव्यवस्थाओं व विसंगतियों का दौड़ है जहाँ लोग पल-पल असंतोष व आक्रोश की जिंदगी जीने को बाध्य हो रहे है। जिस सामाजिक व्यवस्था के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जीने की सोच होनी चाहिए थी उसमें सेंघ मारा हुआ जान पड़ता है। जाति, धर्म, वर्ग, लिंग, क्षेत्रवाद आदि के नाम इस कदर अपने मे लोग भेद-विभेद कर लिए है कि लोग संयुक्त परिवार की कल्पना तोड़ एकांत में अकेले व मनमर्जी की जिंदगी जीने को विचलित जिद्द करते है। पाशविक प्रवृत्तियां इस हद तक असर करता दिखाई देता है कि लोग मर्यादाओं को सिमा लाँघ कर चलना अपनी मजबूरी मानते है । और इस नकारात्मक सोच व व्यवहार का ही नतीजा है कि आज समाज विचलनशीलता की ओर अत्यधिक गतिमान हो चला है। निराशा, आक्रोश, असंतोष आदि नकारात्मक संवेग इस कदर लोगों में बढ़ गया है कि वो कानून को हाथ मे लेने से बाज नही आते है। ना भय खाते है। ना घबराते है। वे हत्या, बलात्कार, शोषण, लूट, अपहरण, मॉब लॉन्चिंग, लोगों को जिंदा जलाना, अन्याय, अत्याचार आदि जैसी घृणित व्यवहार हो या फिर नक्सली या आतंकी जैसी कोई समाज विरोधी व देशद्रोही गतिविधियां इत्यादि क्यो ना हो या किसी भी तरह की जुल्मोसितम क्यो ना हो लोग मानवीय भावना को कलंकित अवश्य कर चल रहे है। दिलों को ठेस पहुंचाने से तनिक नही लजाते है उल्टे ताकत व पहुंच दिखाते है।
इस दहलती मानवता के पीछे लाख इसका कारण वर्त्तमान जीवन शैली, दोषपूर्ण समाजीकरण, नशा, अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, नेताओं की वादाखिलाफी व्यवहार, आर्थिक क्षति या परेशानी, अनुकरण, लालसा, सोशल मीडिया, आदि को कारण इसका बता दे मगर इतना तो तय है लोग आत्म मंथन करना छोड़ दिये है। जहां सहानुभूति दिखावे का रह गया तो वहीं लोग परानुभूति से अपने को दूर करते जा रहे है। ज्यादातर लोग दर्शनशास्त्र के उस चारबाग सिद्धांत अर्थात सुखभोगने के लिए जो भी करना पड़े करे की नीति को पक्षधर हो चले है जहां इन जरुरतों की पूर्ती भी कुकर्म, बेईमानी ,भ्रष्टाचार व छल-प्रपंचों के वैश्विक बाजार से करते है तो वही नैतिकता हरकदम दम तोड़ रही होती है। कुलमिलाकर कहे अमानवीय सोच व पाशविक प्रवृत्तियों ने पूरी मानवता को दहला कर रख दी है।

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