सियासी विचलन में मोहरा बनती जनता, जीहुजूरी करती मीडिया :डॉ विनोद शर्मा

डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर,
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग,
एस पी कॉलेज, दुमका।

राजनीति का उद्देश्य जहाँ मानव सेवा करना मात्र था वही आज स्वहित व स्वार्थ सिद्धि का केंद्र बन गया है। अरस्तु ने कहा कि सामाजिक जीवन के समस्त आयाम अर्थात सांस्कृतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, नैतिक, राजनीतिक व आर्थिक जीवन शैली को सम्पन्न करते है जो ये मानव जीवन के सारे आयाम एक धुरी से परस्पर जुड़ी है जिसका समन्वित करने का कार्य राजनीति का होता है। इसलिए राजनीति की ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा अहम स्थान रखता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी राजनीति को सेवा भावना से काम करने की आध्यात्मिक नीति के साथ सत्य और अहिंसा के राह चल मंजिल हासिल करना बतलाया। उन्होंने राजनीति को धर्म व नैतिकता के बंधन में बांधते हुए कहा कि धर्महीन राजनीति की कल्पना करना सबसे बड़ा पाप है। जो आज अधर्म की राजनीति चारों ओर दिखाई देती है। गांधी जी ने छल-कपट की राजनीति की निंदा करते हुए इसे सर्प के व्यवहार से जोड़ा। इतना ही नही उन्होंने राजनीति में धर्म व नैतिकता के सभी नियमों को ताक पर रख कर चलने वालों को धूर्त, सियार-सा चालाक, अवसरवादी, विवेकशून्य जैसे राजनीतिज्ञ माना जिसके कार्यशैली से समाज मे वैमन्यस्य , अराजकता व असंतोष के माहौल बनने का पूरा उम्मीद होता है जो स्वस्थ्य व मर्यादित समाज के लिए खतरा पैदा हो सकता है। मौजूदा राजनीति हालात ने हर तरह से देश मे अशांति, तनाव व असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया जिसे भी फ्रायड के अचेतन सिद्धांत की कसौटी पर कस कर दमित राजनीति भावना को उजागर करने की भी जरूरत है जो तमाम राजनीतिक विकृतियों को पनाह देती है। कहना ना होगा देश मे लोकतांत्रिक व्यवस्था को जीवित रखने व उसे अपेक्षित महत्व देने के लिए राजनीति व राजीनीतिक इच्छा शक्ति का होना बहुत जरूरी है। राजनीति की आवश्यकता इसलिए नही की यह समाज, राज्य व देश को एक सफल, यथार्थ व सार्थक नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखता है व देश की दशा व दिशा देने की ताकत रखता बल्कि इसलिए इससे समाज में मानवीय व नैतिक मूल्यों की भी रक्षा की गारंटी मिलती है। राजनीति का उद्देश्य इन बातों को पूरा करने के अतिरिक्त नेताओं को ईमानदारी व आदर्श के राहों चलते, निःस्वार्थ व निष्पक्ष भाव से संविधान प्रदत्त बातों से जनता को ना केवल जागरूक करना है बल्कि देय लाभों को भी जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना भी है। इतना ही नही देश की अस्मिता की रक्षा करते हुए देश के भीतर जनता को लोकप्रिय व हितकारी सरकार भी देना है। जनता को वो सेवा देना जिसका कि उसे हक बनता है। उनके भावनाओं को ख्याल करते हुए सुख, शांति, प्रेम, सुरक्षा व सामाजिक सौहार्द का वातावरण देना है। ऐसा कोई असंतोषजनक कार्य ना हो जिससे समाज मे असंतोष उतपन्न हो। चिंता, तनाव, विषाद आदि का जनता में कोई मनोविकारी भाव उतपन्न हो।
राजनीति का उद्देश्य शायद यह भी है कि देश को किस तरह विकास के पथ पर ले जाते हुए देश को आत्मनिर्भर बनाए। विकसित राष्ट्र की श्रेणी में ले जाकर खड़ा करे। ऐसा विश्वास लोगों के दिलोदिमाग में घर करे।
आजादी के पूर्व व बाद भी कुछ ऐसा ही राजनीतिक उद्देश्य अवश्य रहा होगा।
मगर आजादी के 74वे साल के बाद की राजनीतिक हालात अर्थात वर्त्तमान राजनीति हालात को देखे तो आज राजनीति सत्ता का केंद्र बन कर रह चली है। कुर्सी का खेल हो चला है। तो दूसरे को नीचा दिखाने का, शक्ति प्रदर्शन करने का एक माध्यम हो चला है। यानि हर तरह से जनता को राजनीति फायदे का मोहरा बनाने का रणनीतियां हो रही है।
बिडम्बना यह है कि जो राजनीति देश की सामाजिक मान-मर्यादाओं व माँ-बहनों के सम्मान की रक्षा के लिए होनी चाहिए उस पर उल्टे राजनीति होती है। जहाँ राजनीतिक कर्त्तव्य मानकों के तहत चलने व लोगो के साथ व्यवहार करने की होनी चाहिए वहीं आज राजनीति भ्रष्टाचार व तनाव का केंद्र बनता जा रहा है। अपने निजी स्वार्थ के खातिर राजनीति गरिमा को भुला बैठा है। अपने उद्देश्यों से जा भटक गया है। विचलित हो चला है। जिसका भावना का ही दुष्प्रभाव है कि आज राजनीति में अपराधीकरण हो चला है। इतना ही नही समाज विरोधी तत्व सभी इसके गले के हार हो चला है। जहां-तहां लोगों की भावनाओं पर कुठाराघात किया जाता है। अपमानित किया जाता हैं। जाति-धर्म के नाम दंगा, फ़साद किया जाता है। आपस मे लड़ाया जाता है। अधर्म फैलाया जाता है। गुनाहों की सीमा बढ़ाई जाती है।
दुःखद आश्चर्य यह है कि कुत्ते की तरह नेता लोग गुंडे, बदमाश, लुच्चे, लफंगे, चोर डकैत को अपने राजनीतिक फायदे के वास्ते ना केवल राजनीतिक संरक्षण देते है, उसे पालते है बल्कि उसे उम्मीदवार बनाते है। उन्हें अच्छा बताते है। अपने टिकट से जिताते है। फिर लूट से शुरू होकर अरबो की घोटाले में हाथ बंटाते है।
जिस राजनीति का उद्देश्य जन भावनाओं व उनके आकांक्षाओं पर खरा उतरना होना चाहिए वो आज कुछेक स्वार्थी तत्वों का ठिकाना वन गया है। जिसके विपथ मन और व्यवहारों का नतीजा है कि समाज मे खुलेआम महिलाओं की ना केवल आबरू लूटी जाती है बल्कि समाज मे अशांति, असुरक्षा, भय, तनाव आदि भी माहौल भी निर्मित हो रहा है। और संभवतः उनके गलत नीतियों का ही परिणाम है समाज मे चारों ओर अन्याय, अत्याचार , नक्सलवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद आदि भी अपना फन उठाये चल रहा है।
इस अस्वास्थ्यकर होती राजनीति से ना केवल लोगों का विश्वास कमतर होता जा रहा है बल्कि कहे इस शब्द से लोगो को नफरत भी होने लगा है। जनता के सहयोग व समर्थन से एकबार जन-प्रतिनिधि या नेता या मंत्री बने नही की भूल जाते है कि उसने किसी से कोई वादा भी किया। अगर ऐसी बात नही होती तो समाज की तस्वीरें कुछ और होती। निर्दलीय उम्मीदवारों को तो क्या कहना। उसका कितना जल्दी विकास हो इस इरादे से चूर रहता है। करोड़ो में बिकने को तैयार रहता है।
दुःख की बात यह भी है कि प्रबुद्ध लोग भी इस सच्चाई को जानते हुए भी उसकी जयकार करते है। सुधारने के बदले शक्तिवर्धन करते है। उसका बिकाऊ मीडिया की तरह जीहुजूरी करते है। उसके साथ जोड़कर अपना सम्मान गढ़ते है। और कमजोरों पर धौस जमाते है।
बिडम्बना ही कहिये कि जिस बात की सच्चाई लोगो को सामने आनी चाहिए वहां मीडिया खुलकर पक्षपात करते देखा जाता है। गुंडे, बदमाश को चंद सिक्को के खातिर सुर्खियों में जगह देकर उसे हीरो बनता है। फालतू व बेकार की छींटा कसी की खबरों को प्रमुखता देते है। दिनरात टी आर पी बढ़ाने के लिए व्यस्त दिखते है। अपंसदनीय व निर्रथक की खबरों से प्रतिस्पर्धा करते देखे जाते है। ऐसे नक्कारा व्यवहारों से आखिर मीडिया जनता को क्या संदेश देना कि चाहती है? दुःखद है कि राजनेता भी इसका फायदा खूब उठाते है। यही वजह हो चली है आज जनता राजनीति के वादा खिलाफी व्यवहारों से मायूस व कुंठित हो चली है। भय, असुरक्षा, तनाव, विषाद, चिंता आदि मनोविकारी संवेगों के साथ जीने को मजबूर हो रहे है।

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