पापा अब मैं कहां जाऊं? डॉ हनीफ की तेरहवी रचना का विमोचन एसकेएमयू कुलपति ने की

दुमका, 01 सितंबर।“पापा अब मै कहां जाऊं“? डॉ हनीफ की है, तेरहवीं रचना का विमोचन सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सोना झरिया मिंज ने मंगलवार को दिग्घी कार्यालय में की। डॉ हनीफ ने जीवन के वास्तविकता और संघर्ष के बीच की आधुनिक मानव प्रवृति और प्रकृति को कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास किया है। कहानियों का एक ससांर है। इनकी भी अपनी एक अलग कहानी है। समाज में हो रहे घटना और इसके फलस्वरूप लोग के मानसिकता में हो रहे भाव को बड़ी हि मार्मिकता से व्यक्त करते कहानी की शालिनता को जन्म देती है। अतंर्राष्टीय ख्यातिलब्ध साहित्यकार डॉ हनीफ शब्द के जादूगर है। शद से कैसे खेला जाता है और इसका प्रयोग किस तरह मानव मस्तिक को झंकझोर देता है, देखने को मलती है। उपन्यास से साहित्य के ससांर में कदम रखते इनके कविता, गजल और लघु कथा भी काफी प्रेरणादायक है। “हल्दी के रंग“ कहानी का बाग्ंला और सथांली में अनुवाद भी हुआ है। “काली बछिया, सलाख में बंद, दर्द कहू या पीड़ा, एक पिता का सच, प्रभाव, स्पर्श, कुछ भूली बिसरी यादें, राख की सौगंध, रात के अधेंरे में, आगंन, ऐसी कहानियां है। जिसे जितनी बार पढ़ा जाए, उतना ही नयापन महससू होता है। पत्थर के दो दिल इनका उपन्यास काफी चर्चित रही और खूब ख्याति बटोरी। एक दर्जन से भी अधिक राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त कर डॉ हनीफ अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, बांग्ला, सतांल, उर्दू और अरबी पर समान अधिकार रखते है। अंग्रेजी के इनके कविता सग्रंह“व्हेयर यू“ और अरूण कोलेटकर्स“जेजुरी, ए क्रिटिकल स्टडी“ स्तरीय रचना डॉ हनीफ ने दी है। “हंड्रेड पोएम्स“ प्रकाशन के अधीन है, जो जल्द ही पाठको के बीच आने वाली है। “पापा अब मैं कहांजाऊं ..?“ एक कहानी संग्रह है। जिसमे कुल छह कहानियां है। जो सत्य पर आधारित है। पापा अब मैं कहां जाऊं ..? यहां कोई नहीं है। शाम होने लगी है। अधेंरा छाने लगा है। बोलो न पापा, अब मैं कहां जाऊं.?। इस कहानी के माध्यम से इन्होने ठगी कर पैसे लेने वाले पर तीखा प्रहार किया है।“तेरी मेरी कहानी“ में लेखक ने प्रेम को परभाषित करते लिखा है कि“नहीं, निकहत, दोस्ती का मतलब समर्पण, त्याग और बलिदान है। अपनी खुशी, अपनी प्रसन्नता का डेडीकेशन ही प्रेम है। किसी की भलाई के लिए खुद को न्योछावर कर देना ही प्यार है। पाने का लालसा प्रेम नहीं है। खुद को खो देने का ही नाम प्रेम है। “कहते-कहते एक युवा लड़के के जिद और जुनून की दिलचस्प कहानी है। “कोई भी इंसान गरीब या अमीर नहीं होता। सिर्फ उसका जन्म गरीब और अमीर परिवार में होता है, बावजूद गुलाब हमेशा काटों के बीच ही हंसता है“। “मुकम्मल मे ये लिखते है कि आखिर तुम ही बताओं राहुल, इस गुलामी से आजादी कब मिलेगी? हम औरत को मुकम्मल जहां कब मिलेगा? कब तक हम अपनी कोख को छुपाते रहेगे? कब तलक सिसकियों के बीच अपने को गुलाम रखेंगे ? आखिर कोई मां ही तो होगी, वह भी न। “कहीं तुम्हे नफरत न हो जाए“ कोरोना पर आधारित एक प्रेम कहानी है। जिसका हरेक पंक्ति डायलॉग है। “अच्छा सलीम तुम मुझे पाने के लिए प्यार करते हो या खोने के लिए..? प्यार करने वाले किसी को पाने के लिए ही प्यार करते है। मरजीना, खोने के लिए नहीं.. अगर किसी का प्यार खो जाए तो..? उसे पाने की कोशिश करनी चाहिए। कोशिश या फिर हिम्मत..? हिम्मत के साथ कोशिश। क्या तुम्हारे अंदर वह हिम्मत है, तो मुझे अपना सको। जी, बिल्कुल। तो जान लो, मैं जिससे प्यार करती थी, उसे कोरोना हो गया और इटली में ही डेमाइज कर गया सलीम“।“पहाड़ी पर के लोग “एक पहाड़ी लडकी के विवशता की कहानी है, जो मुबंई शहर के कंपनी में काम करती है। उसकी सुरीली आवाज, उनकी व्यथा, पीड़ा और दर्द की अभिव्यक्ति है, जो अश्रुपूर्ण एवं द्रावक है। जी, अभिषेक, पहाड़ी पर के लोग के अदंर दिल नहीं होता, आत्मा नहीं होती, पढ़े-लिखे भी नहीं होते और बेईमान भी नहींकृ। वस्तुतः डॉ हनीफ की यह रचना अद्वितीय और सामाजिक के साथ-साथ प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक है। सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय के एसपी महिला कॉलेज के अंग्रेजी शिक्षक डॉ हनीफ की लिखी तेरहवीं पुस्तक, पापा अब मैं कहां जाऊं “का कुलपति डॉ सोना झरिया मिंज ने विमोचन की। भूमिका पूर्व कुलपति प्रो बसीर अहमद खान और प्रथम पृष्ठ पर प्रशंसा पूर्व कुलपति प्रो कमर अहसन ने की है।

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