अव्यवस्थाओं के तड़पन से विकृत होते मानव व्यवहार:डॉ विनोद शर्मा

अव्यवस्थाओं के तड़पन से विकृत होते मानव व्यवहार:डॉ विनोद शर्मा

डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग,
एस पी कॉलेज, दुमका।
एक ओर जहां पूरा विश्व वैश्विक कोविड-19 के रोग संक्रमण से प्रभावित होकर जिंदगी और मौत से दिन रात जूझ रहा है तो वहीं कमजोर होती अर्थ व्यवस्था भी चिंता उत्पन्न कर रही है। एक ओर जहां लोग बेकाबू कोरोना के भय से मानसिक संतुलन बिगाड़ मानसिक विकारों को जन्म दे रहे है तो वहीं दूसरी तरफ लोग आर्थिक क्षति व बेरोजगारी से उत्पन्न तनाव में आकर विषादों के समुंदर में गोते लगा रहे है।
इतना के वाबजूद दूसरी तरफ चलंत सामाजिक अव्यवस्था के आचरणों से तड़पकर लोग मौत को विकल्प के रूप में चुन रहे है। मानों दुनिया मे एक दूसरे से उम्मीद का भरोसा खत्म हो गया हो। किस पर विश्वास करे , किस पर ना करे यह उसके समझ से परे की बात होता मालूम पड़ता है।
आज प्रेम की विफलता में आत्महत्या की बात हो या आर्थिक नुकसान या बदनामी या निंदा या असहायपन की तीव्र व्यथा या फिर सामाजिक कुव्यवस्था की घुटन भरी जिंदगी या संवेगों का तड़पन सभी मानव संपदा को नुकसानदेह बनाने वाला कारक है जहां सांवेगिक आक्रोश में आकर लोग या तो अकेले मरते है या पूरा परिवार के साथ आत्महत्या कर लेते है। या आक्रमकता की ब्यार कहीं बाहर बह उठी तो हत्या या फिर नरसंहार की कहानी लिख देती है।
बच्चों को स्कूलों में वर्षो से यह पढ़ाया जा रहा है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जहाँ वे रिश्तों के मकड़जाल की तरह एक दूसरे से आपस मे जुड़े होते है। वैसे रिश्ते जहाँ भावनाओं की कद्र होती हो। विश्वासों की ज्योति जलती हो। मानवता के हितैषी हो। एक संस्कृति में बिना भेदभाव के समरस भाव से जीते हो। ऐसा वातावरण जिसमे स्वार्थी इड हरहाल में सामाजिक मानकों के उत्तरदायी व वास्तविकता के समर्थक ईगो अर्थात अहम के नियंत्रण में हो। जिससे ना केवल मनोविकारी शक्तियां काबू में हो बल्कि नैतिकता की बाग भी लहलहाता रहे।
1947 में भारत आजादी के बाद सन 1950 में भारतीय संविधान को लागू किया । शायद यह सोचकर ही की देश की तमाम नागरिक एक सभ्य व मानकों का सुआचरण परिचय देंगे। गर्व से कहे तो इस संविधान ने भारतीय जनमानस में अधिकार व कर्तव्यों के बीच व्यवहार करने की सोच जगाई जो आजादी के अर्ध शतक के बाद भी ऐसा लगता है कि मानो वो सपने सारे उम्मीदों के विपरीत घटित होते नजर आ रही हो। देश को आत्मसम्मान व गौरव की उच्च शिखर पर पहुंचाने का दायित्व जनता के आपसी विश्वास व सहयोग के साथ जहां न्यायपालिका, विधायिका व कार्यपालिका का परम कर्तव्य होना चाहिए वो आज लोगो मे आने कार्य व्यवहार से सांवेगिक विक्षोभ उत्पन्न कर रहा है। ऐसा नही कि विकास कार्य बाधित है। मगर व्यवहारिक निष्पक्षता नही है। बल्कि आमजनों के लिए भय का केंद्र हो गया है। राजनेता जहां अपने स्वार्थ में वशीभूत होकर जनता के भावनाओं के साथ खेलते है, वादाखिलाफी करते है तो वही न्यायपालिका इंसाफ को बेचती है। बलि चढ़ाती है। न्याय में भेद करती है। निर्दोषों को सूली पर चढ़ाती है। चंद पैसे की लालच तो कहीं दवाब में आकर कमजोर व बेगुनाहों को चोर, गुंडा, बदमाश, कातिल साबित करने पर तुलती है। क्योंकि ये अंधा कानून है। रही बात कार्यपालिका की तो ये वही करते है जिससे सरकार खुश हो। शायद इसलिए भी उनको प्रोमोशन का रास्ता सुरक्षित व आसान रहे । कमीशन का खेल अनवरत जारी रहे। इतना ही नही ये गैर सामाजिक व्यवस्था का रोग संक्रमण जीवन के विभिन्न हिस्सों में देखा देखी फैल-सा गया है। शिक्षा हो कि स्वास्थ्य जगत या सरकारी कोई कार्यालय उग्र आवेग को करने को हरकते देखने को तमाम मिलती है। यही वजह है कि निजी संस्थानों ने भी इसी के आड़ में गुणवत्ता के नाम भ्रष्टाचार का दूसरा केंद्र खोल रखा है। जहाँ सबों में इस बात की प्रतियोगिता होती है कि पद कुछ नही होता है जो ज्यादा घुस से पैसा कमायेगा वो उतना इज़्ज़तदार कहलायेगा। शायद कहानीकार प्रेमचंद ने गुलामी के दिनों अपने कहानी ‘नमक के दरोगा’ में बहता स्रोत इसी संदर्भ में बात रखा गया था। यानी आजाद भारत को जिन बुरी आदतों से बचा कर चलना चाहिए था वो आज भी कुष्ठ रोग की तरह हर क्षेत्र में बदनुमा दाग बनकर लोगो को आक्रोशित कर चल रहा है। तरह -तरह के असंतोष व मनोविकार उत्पन्न कर चल रहा है। यह बिडम्बना है कि आज एक मामूली से काम के लिए भी लोगों को ना केवल ऑफिस का चक्कर लगाना पड़ता है, गिड़गिड़ाना पड़ता है, हाथ जोड़ना पड़ता है बल्कि पैसे भी देने को बाध्य होना पड़ता है। हक वो इंसाफ की लड़ाई के लिए मत पूछिए की क्या-क्या कीमत चुकानी पड़ती है। ऊपर से सामाजिक निंदा की मार अलग से झेलनी उड़ती है। यहॉ वो बजह भी है कि बहुत से निंदनीय बातें सुर्खियों में नही आती है। इंसाफ मांगने से बेहतर खुद को रास्ते से हटा देना इस कुव्यवस्था में बेहतर समझते है। जरूरत है इस कुव्यवस्था को सेनीटाइज़्ड करने की। भ्रष्ट आचरणों से सोशल डिस्टेंसिंग करने की।
आज लोग आत्महत्या क्यों बढ़ रही है। कारण ढूंढेंगे तो सभी मे कहीं -न-कहीं व्यवस्था के प्रति सांवेगिक विक्षोव, वैसी तड़पन व अविश्वासों की कहानी होगी जिसको सुध लेने वाला कोई नही। शायद कोई ऐसा हो जो बिना मतलब या हित साधने के लोगों को सामने मदद को सामने आये।
गरीब,लाचार व असहायों का इंसाफ तो भगवान के भरोसे ही होता या रहता है। ऐसी अराजक व भ्रष्ट व्यवस्था से लोग उम्मीदों की लंबी लड़ाई लड़ने के बनिस्पत निदनीय जिंदगी से बचने को लोग मौत का रास्ता चुनना ही श्रेष्कर समझते है। जिसका प्रमाण आये दिन अखबारों की सुर्खियों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाएं है। जिसे रोकने के कई राष्ट्रव्यापी मनोचिकित्सीय प्रयासों के बावजूद घटनाये घट रही है। संवेगों की तड़पने ना तो कम ही हो रही है औऱ ना ही सांवेगिक विक्षोभों को इंसाफ भी जल्द मिलता नजर आता है। फिर भी समाज मे अच्छे पहल की उम्मीद की जानी चाहिए जिससे उन तमाम विसंगतियों , कुव्यवस्थाओ व सांवेगिक विक्षोभों पर पूर्ण विराम लगे।

Niraj Singh

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