प्रियंका रेड्डी कांड निर्भया की दुहराती शर्मनाक गाथा

प्रियंका रेड्डी कांड निर्भया की दुहराती शर्मनाक गाथा

डॉ विनोद कुमार शर्मा,
असिस्टेंट प्रोफेसर
सह
निदेशक, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग, एस पी कॉलेज, दुमका।

आंध्र प्रदेश की राजधानी में हैदराबाद की जमी पर डॉ प्रियंका रेड्डी के साथ घटी यह शर्मनाक घटना जहां दरिंदो ने ना केवल उसके मजबूरी व अकेलेपन का फायदा सामूहिक बलात्कार के रूप में उठाया बल्कि साक्ष्य छुपाने के इरादे से पेट्रोल छिड़ककर जिंदा जलाकर मार भी दिया जो पूरी मानवता को ताड-ताड कर देने वाली अत्यंत दुखदाई घटना है। यह निर्भया कांड को दुहराती शर्मनाक गाथा की तरह ही है जो स्त्री जाति के लिए ना केवल सुरक्षा का प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है बल्कि उनके प्रति समाज की नजरिया को उतना ही गिरा हुआ साबित करता है। इस घटना के बाद ना जाने कितने लोगों ने उस बहसी दरिंदा बलात्कारी को फांसी पर चढ़ा देने की आवाज़े बुलंद की। कुछ ने तो सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेकर उन बहसी दरिंदो को खोजकर चौराहे पर सूली पर लटका देने की अपील की। कहना ना होगा उस पापी को पकड़ने के लिए पुलिस प्रशासन ने भी ना केवल अपने आखों की नींदे गवा बैठी होगी बल्कि अपना सुख चैन भी गवा बैठे है कि कितना जल्द जुल्मियों को पकड़ कर सामने ला खड़ा करें। बात यह भी होगी कि ऐसे अमानवीय कृत्यों को देख सरकार भी सख्त कानून बनाने की कल्पना कर रही होगी। क्या भारतीय संस्कृति का बदलता व्यवहार है? वाह रे नैतिकता तेरा जवाब नही! क्या संस्कार दिया उस मा-बाप व समाज ने की हैवानियत की सारी हदें पार कर दी। निर्भया घटना के बाद लगा कि शायद यह पहली व आखरी घटना होगी जिसने पूरी मानवता को शर्मशार कर दिया है। लेकिन ऐसा नही हुआ। इस घटना के बाद भले ही सख्त कानून देश मे बन गए हो, लेकिन देश व समाज के लोगो ने सबक नही लिया। इसका मतलब साफ है इस व्यवस्था में छेद है जिसके ही आड़ में यह बहसी वायरस बार-बार ऐसी घटनाओं को अंजाम देने के लिए अंदर -ही- अंदर उसकता रहता है। टेली मीडिया हो या प्रिंट मीडिया अपने स्तर लोगों में ऐसी हरकते करने के प्रति भय का माहौल जरूर बनाने का प्रयास किया है लेकिन दो-चार दिन के गहमागहमी व सुर्खियों में बात आने जाने के बात पुनः शांत हो गया। मानो कुछ पल के शोक संताप व चर्चा के बाद बात पुरानी साबित हो गई। बात वर्षों पुरानी हो गई हो। इन बातों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो कहना होगा कि इड जो आनंद के नियम पर काम करता है वह वास्तविकता अर्थात सामाजिक मनको पर चलने वाले ईगो तथा नैतिकता के समर्थक सुपर ईगो पर अपना पूर्ण वर्चस्व बना बैठा है। यानी कमजोर सामाजिक व प्रशासनिक व्यवस्था व लचर नैतिक आचरणों ने व्यक्ति के इड को इतना अधिक वासना या लैंगिक आनन्द के लिए खुला छूट दे रखा है कि वो किसी भी हद को पार कर जाने में अपनी शान समझता है। इड प्रधान मानसिकता को शायद यह बात ज्ञात होता है कि ऐसा गलत कर वह उतना अधिक दंडित नही होगा जिससे कि उसे डरने की जरूरत मात्र भी है। मानो वो इस सामाजिक व्यवस्था को लचर व कमजोर मानता हो।शायद वो यह समझता है कि इस भ्रष्ट व्यवस्था में पैसा व पहुंच के बल कुछ संभव कर सकता है। फिर जहां चाहा पैसा से या फिर पहुँच दिखाकर गुनाहों से अपने को मुक्त कर लेता है। यही शायद उसकी ताकत भी है जिसके बल अपने को ताकतवर समझ मासूमो व कमजोरों के इज़्ज़त से खेलता है।
ऐसा नही की हर दुष्कर्म घटना के पीछे इड की प्रबलता ही होती है। बहुत से कारण रहते होंगे।फिर भी, ऐसी घटना को अंजाम देने की सोचना पाशविक मानसिकता को ही दर्शाता है। फिर यह भी सवाल उठता है कि ये ऐसी नकारात्मक व पाशविक प्रवृत्तियों की चलन में तेजी क्यो? क्यो मानव मूल्य इतना गिरता जा रहा है? क्यो नारियों के सम्मान में सेंध मारा जा रहा है? बिडम्बना है कि एक तरफ देश मे नारी को देवी सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा आदि के रूप में घर-घर लोग पूजते है , उनसे हाथ जोड़कर आशिर्वाद की भीख मांगते है तो वही दूसरी और उनके इज़्ज़त आबरू से खेलते है। बहुत ही शर्म की बात है। कहना ना होगा इस कुकृत्यों पर अंकुश लगाने के लिए मीडियाबाजी खूब हुआ , लोगो ने सड़को पर मोमबत्तियां जलाई, प्रशासन को हाय-हाय किया गया, आदि क्या कुछ नही किया गया। इतना ही नही पूरे गांव-शहर को मानवता के नाम लोगों को झकझोड़ दिया गया। बावजूद ऐसे घटनाओं में बढ़त क्यो? मनोविज्ञान की माने तो लीबिडो ने अपना दायरा इड के प्रभाव में बढ़ा दिया। सामाजिक वातावरण ने वैसे लोगो के दिलोदिमाग में थेनाटोज अर्थात विधवंस मूल प्रवृति को ज्यादा मात्रा में घर कर दिया है जहां लोग सामाजिक मानमर्यादाओ के विरुद्ध व्यवहार करने को आमदा होता है। कहे तो सामाजिक व राजनीतिक असंतोष व भ्रष्ट आचरण ने भी ऐसे घटनाओं के घटित होने में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से आग में घी का काम करता है। जहां ना केवल पूरी मानवता शर्मशार होती जा रही है बल्कि आने वाले पीढ़ी के लिए भी खतरा पैदा होता मालूम पड़ता है। तो क्या अब उम्मीद की जा सकती है की अब आगे निर्भया की गाथा नही दुहराई जायेगी? क्या इस बात की कोई निश्चित गारंटी तय की जा सकती है कि यह आख़री घटना ही होगी? क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि इतनी क्रूर व विभत्स घटना के बाद पूरे देश मे सामाजिक चेतना जागेगी, गलत मानसिकता को भय होगी, नारियों के प्रति सम्मान व आदर का भाव बढ़ेगा, आदि आदि। आखिर कब यह आग बुझेगी? कब ऐसे मानवीय विपदा से बचेंगे? क्या 21 सदी के वैज्ञानिक युग व उच्च मानसिकता के मध्य ऐसे निंदनीय व्यवहारों को प्रश्रय मिलती रहेगी?

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