प्रथम राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद की मनायी गई जयंती

प्रथम राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद की मनायी गई जयंती

अधिवक्ता संघ ने उनके मार्गो पर चलने का लिया संकल्प

दुमका। भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद की 135 वीं जयंती पर उन्हें शत्-शत् नमन। डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर 1884 को जीरादेई में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई थी। उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए कलकत्ता आ गए। यहां उन्होंने वकालत में मास्टर ऑफ डिग्री की उपाधि हासिल कर कलकत्ता में ही वकालत करने लगे। पढाई के साथ-साथ राजेंद्र बाबू को खेलकूद के अलावे राजनीति में भी उनकी गहरी रूचि थी। बंगाल से बिहार जब अलग हुआ तो डॉ राजेंद्र प्रसाद कलकत्ता से पटना आ गए और पटना हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। उन्होंने पटना में भारत सेवक समाज नामक संगठन की स्थापना की। जिसके माध्यम से डॉ राजेंद्र प्रसाद वैसे लोगो को शिक्षा उपलब्ध कराने लगे जिन लोगों ने गरीबी के कारण अपनी पढाई बीच में ही छोड़ दिये थे। उस समय अंग्रेजो के खिलाफ महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आदोंलन चल रहा था। राजेंद्र बाबू अपनी वकालत छोड़कर आदोंलन में कूद पडे। डॉ राजेंद्र प्रसाद को दुमका से लगाव था, वे कई बार दुमका आये और स्वतंत्रता सेनानियों का मार्ग दरशण करते रहे। एक बार वर्ष 1940 के नवंबर माह में दुमका आए थे। वे यहां की शिक्षा वयवस्था में बढोतरी के लिए यहां एक वृहत् विधालय कि स्थापना करना चाहते थे। दुमका के एक प्रतिष्ठित ब्यावसायी रामजीवन हिम्मतसिंहका ने बांधपाडा मे पांच बीघा का एक बड़ा सा भूखंड गरीब बच्चों के लिए शिक्षा की वयवस्था एवं उनके विकास के लिए डॉ राजेंद्र प्रसाद के नाम से रजिस्टर डीड ऑफ गिफ्ट बनाकर दान कर दिये। डॉ राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय राजनीति में व्यस्त हो गए। उस समय ऐसा माहौल आया कि देश के सारे नेता आजादी के लिए एक सूत्री प्रोग्राम को लेकर संघर्ष करने लगे। दुमका में विद्यालय स्थापित करने का काम बांकी ही रह गया। वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद भारतीय संविधान के निर्माण में डॉ राजेंद्र प्रसाद व्यस्त हो गए। संविधान तैयार होने के साथ ही डॉ राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति की जिम्मेदारी सौंपी गई। दो-दो टर्म राष्ट्रपति रहे 28 फरवरी 1962 को उनका देहांत सदाकत आश्रम पटना में हो गया। दुमका में राजेंद्र बाबू को दान में मिली जमीन पर कांग्रेसियो ने कब्जा करने के लिए इसका नामांतरण कांग्रेस पार्टी के नाम करा लिया। स्थानीय स्तर पर इसका विरोध होने लगा। मैं स्वयं इसके खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और राजेंद्र बाबू के पौत्र अरुणोदय प्रकाश और बालाजी वर्मा के साथ मिलकर कांग्रेस के मनसूबे को विफल किया। कांग्रेस पार्टी के लोग यहां पार्टी कार्यालय बनाना चाहते धे और इसका अपने हित में उपयोग करना चाहते थे। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने हाईकोर्ट रांची में एक याचिका डा राजेंद्र प्रसाद के पौत्रौ के विरुद्ध दायर कर रखा है कि इस जमीन पर मालिकाना हक कांग्रेस पार्टी को दिया जाए। दुमका में डा राजेंद्र प्रसाद को दान में मिली जमीन पर गंदगी का अंबार लगा हैं। नगर परिषद का नाला का गंदगी डॉ राजेंद्र प्रसाद के स्मारक स्थल पर गिर कर मैदान को कीचड़ युक्त बना दिया है। चारों ओर गंदगी व्याप्त है। नगर परिषद इसकी साफ-सफाई नहीं कराता हैं। पूरे भारत में स्वच्छता अभियान के तहत साफ-सफाई हो रही है, डॉ राजेंद्र प्रसाद के स्मारक स्थल कि सफाई नहीं हो रही है। प्रशासनिक स्तर पर ही नहीं राजनीति स्तर पर भी उपेक्षा हो रही है। इनके समकक्ष नेताओं की बडी-बडी समाधि स्मृति और स्मारक बनाएं जा रहे है। लेकिन डॉ राजेंद्र प्रसाद के लिए ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। इधर जिला अधिवक्ता संघ ने डॉ राजेंद्र प्रसाद के जयंति के अवसर पर अधिवक्ता दिवस मनाया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघ अधिवक्ता अध्यक्ष गोपेश्वर झा ने डॉ राजेंद्र प्रसाद के जीवनी को विस्तार से बताया।

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