आक्रामकता के खिलते फूलों से दुर्गन्धित समाज:डॉ विनोद कुमार शर्मा

आक्रामकता के खिलते फूलों से दुर्गन्धित समाज:डॉ विनोद कुमार शर्मा

डॉ विनोद कुमार शर्मा
असिस्टेंट प्रोफेसर
निदेशक
मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र,
मनोविज्ञान विभाग,
एस पी कॉलेज, दुमका।

वर्त्तमान समय में लोग तनाव, भय व विषादों की राह चलने को मजबूर हो रहे है। देश मे करीब आधी आबादी मनोविकारी लक्षणों से प्रभावित है तो वही 7.5% लोग विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों से ग्रसित है। यह बात चाहे कोविड-19 के संदर्भ में उत्पन्न भाव या परिस्थितियां हो या सामाजिक-राजनैतिक हालात से उत्पन्न विसंगतियां। लोग सभी तरह से तंग है। परेशान है। आलम यह है कि एक ओर जहां वे मानसिक द्वंद्ध व असंजस्य की स्थिति से गुजर रहे है वहीं जीवन की निराशाएं उन्हें चैन की शुकुन नही देती है। जीवन की विभिन्न भागों से उठने वाली ये निराशाओं की लहरें ना केवल उसके अहम को कमजोर बना रहा है, उसके आत्मविश्वास को कमजोर कर रहा है, संज्ञानात्मक क्षमता में विसंगति उत्पन्न कर रहा है बल्कि अहम रक्षार्थ रक्षा प्रक्रमो का व्यवहार करने की अक्षमता उसमे आक्रामकता की उग्रता को बढ़ा देता है।
साधारण शब्दो में इस बात की मनोवैज्ञानिक व्याख्या करे तो कह सकते है कि किसी भी काम की असफलता से व्यक्ति में निराशा का भाव उत्पन्न होता है और यह निराश व्यक्ति के मन मे आक्रामकता का असरदार बीज बोता है।
अमूनन सामान्य तौर पर मानव जीवन में जहां-कहीं भी प्रत्याशित कार्यो या अपेक्षित बातों या उम्मीदों से असफलता हाथ लगती है तो असफलता से उत्पन्न यह हानि उसके लिए निराशाओं की सुनामी लाता है जिसकी आक्रामकता का कहर इतना प्रभावी साबित होता है कि लोग मानव मूल्यों को नुकसान पहुंचाने को आमदा हो जाते है। वो यह भूल जाते है कि उसके लिए मानवता या मानव मूल्य भी कोई चीज है। वो मृत्यु मुलप्रवृतियों से इतना घिर जाता है कि वो विध्वंसक कार्य करने को बाध्य हो जाते है। इसी नकारात्मक आक्रामक भावनाओ का परिणाम होता है कि व्यक्ति दूसरे की हत्या कर देता है या फिर स्वयं को सामाजिक निंदा व आत्मग्लानि या हीनता के भाव से सदा के वास्ते निजात पाने के इरादे से खुद को नुकसान पहुंचा देता है यानि वो आत्महत्या कर लेता है जो कहे यह डरपोक, कमजोर या कायर मानसिकता का प्रतीक या परिचय है।
मनोविज्ञान इस आक्रमकता से उत्पन्न हत्या व आत्महत्या की घटनाओं की जड़ की व्याख्या में इस बात को मानता है कि व्यक्ति जीवन मे अपने क्षमता की हैसियत से सामाजिक मानकों , संस्कृतियों व नियम-कानूनों के तहत कुछ पाने की मन मे तरह-तरह की उम्मीदें जगाता है व जिसे पाकर एक खुशी जीवन व्यतीत करना भी चाहता है। मगर जब उन्हें उन सभी बातों से निराशा हाथ लगती है जिसकी वो ख्वाईश कर रखा होता है। साथ ही बात या भावना को आवश्यक रूप से सच्चाई में तब्दील होना चाहिये था वो प्रभावी वातावरणीय कारको के चलते नही हो पाता है तो हाथ लगी यह विफलता उसमे निराशाओं को गंगोत्री खोल देता है। जो मानव बर्वादी का कारण बनता है। ये गंगोत्री जिसके मूल में आक्रामकता सवार होती है उसे यथार्थ जिंदगी के दो दिशाओं में बहने के लिए बाध्य कर देती है जिसका निर्धारण सामाजिक संस्कार व व्यक्तिगत शीलगुण करता है कि उस आक्रामकता के बहाव को कौन-सा दिशा दे। फिर भी ये दो तरह की होती है। जो इस प्रकार है:
1. आंतरिक आक्रामकता: जब आक्रामकता का बहाव आंतरिक अर्थात खुद के भीतर की ओर होता है तो व्यक्ति खुद को मिटा देता है। वो अपने को सब बातों का कसूर बार मानते हुए अपराध भावना से इतना घिर जाता है कि वो आत्म हत्या कर लेता है।
2. हत्या: जब यही निशाश से उत्पन्न आक्रामकता का बहाव बाहर की ओर यानि समाज के खास लोगों , समाज , समुदाय या संस्था के प्रति हो जाता है तो वैसे हालात में अंजाम की परवाह किये बैगेर लोग दूसरे की हत्या कर देता है। सामाजिक व राजनीतिक व्यवहारों से उत्पन्न असंतोष की भावना उसे ना केवल उग्र व आक्रामक बनाता है बल्कि तरह-तरह के बगावत को भी उसकता है जिस बात का समर्थन आये दिन अखबारों की सुर्खियों से होती रहती है। यह मोब लीनचिंग की घटना हो या नरसंहार हो, नक्सली घटनाये हो, घेरलू हिंसा हो, सास-बहू या पति-पत्नी के झगड़े, या प्रेम-प्रसंग में कई गई हत्याएं हो आदि सभी बाहरी आक्रामकता को उजागर करता है तो वही वो अपनी पीड़ा को अप्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित भी करते है।
जीवन मे कल्पित चीजो को सच करना या परिकल्पित चीजो को हासिल करना लोगो की यह एक सामाजिक आवश्यकता भी है कि वो किस तरह की जिंदगी जीना पसंद करता है जिससे कार्य व व्यवहारों को सामाजिक अनुमोदन व प्रशंसा मिलें। सामाजिक मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैसलो (1954) ने भी अपने आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धांत के तहत विभिन्न पायदानों में जीवन की आवश्यकता को प्राप्त करने संबंधी बातों को उजागर किया है। जिसमे व्यक्ति जीवन की जैविक आवश्यकताओं से शुरू कर अंतिम लक्ष्य आत्मसिद्धि तक पहुँचने का प्रयास करता है। मगर इन्ही पायदानों को चढ़ने में जीवन मे तरह-तरह विसंगत चुनोतियों का सामना करना पड़ रहा है। सामाजिक वातावरण के अस्वास्थ्यकर व असुरक्षित हो जाने से लोगो मे ना केवल तनाव, भय, चिंता, विषाद जैसे मानसिक विकारों का तांता लग रहा है बल्कि सामाजिक असंतोष व निराशा से लोग उतना ही उग्र हो रहे है। लोगो की मनोदशा इतना अधिक क्षुब्ध हो चल रहा है कि उसे भी नही पता कि उसका अगला कदम क्या है अर्थात उसका कौन-सा व्यवहार होगा या रुद्र रूप होगा।
समाज में यह आक्रमकता बढ़े नही जरूरी है उन सभी पहलुओं पर पुनर्विचार करने की। सुधारात्मक परिवर्तन करने की जिससे इन नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण पाया जा सके।

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